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निवेदन है कि दिल्ली उच्च न्यायालय में हिंदी में भी कार्यवाही की व्यवस्था की जाए और जनता को अपनी भाषा में न्याय पाने का ह

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  • suraj
    महोदय, हिंदी को व्यवहार में लाने की अपील सरकार द्वारा रेलवे
    Message 1 of 1 , Sep 24, 2013
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      महोदय,

      हिंदी को व्यवहार में लाने की अपील सरकार द्वारा रेलवे स्टेशनों तथा अन्य सरकारी कार्यालयों में की जाती है, परन्तु अचरज है विश्व के इस सबसे बड़े प्रजातंत्र में आजादी के 66 साल बाद भी सुप्रीम कोर्ट व दिल्ली हाई कोर्ट की किसी भी कार्यवाही में हिंदी का प्रयोग पूर्णत: प्रतिबंधित है। यह हमारी आजादी को निष्प्रभावी बना रहा है। संविधान के अनुच्छेद 348 के खंड 1 के उपखंड (क) में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट और हर हाई कोर्ट में सभी कार्यवाहियां केवल अंग्रेजी भाषा में होंगी। हालांकि इसी अनुच्छेद के खंड 2 के तहत किसी राज्य का राज्यपाल यदि चाहे तो राष्ट्रपति की पूर्व सहमति सेहाई कोर्ट में हिंदी या उस राज्य की राजभाषा के प्रयोग की अनुमति दे सकता है।


      संविधान लागू होने के 63 वर्ष बाद भी केवल चार राज्यों राजस्थान, यूपी, मध्य प्रदेश और बिहार के हाई कोर्ट में हिंदी के प्रयोग की अनुमति है। हालाँकि भारतीय संसद में सांसदों को अंग्रेजी के अलावा संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित सभी 22 भारतीय भाषाओं में बोलने की अनुमति है। श्रोताओं को यह विकल्प है कि वे मूल भारतीय भाषा में व्याख्यान सुनें अथवा उसका हिंदी या अंग्रेजी अनुवाद सुनें, जो उन्हें उसी समय उपलब्ध कराया जाता है। अनुवाद की इस व्यवस्था के तहत उत्तम अवस्था तो यह होगी कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में भी एक या एक से ज्यादा भारतीय भाषाओं के प्रयोग का अधिकार जनता को उपलब्ध हो।


      किसी भी नागरिक का यह अधिकार है कि अपने मुकदमे के बारे वह न्यायालय में बोल सके। परंतु अनुच्छेद 348 की इस व्यवस्था के तहत सिर्फ चार को छोड़कर शेष सभी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में यह अधिकार अंग्रेजी न बोल सकने वाली देश की 97 प्रतिशत जनता से छीन लिया गया है। इनमें से कोई भी इन न्यायालयों में मुकदमा करना चाहे, या उस पर किसी अन्य द्वारा मुकदमा दायर कर दिया जाए तो मजबूरन उसे अंग्रेजी जानने वाला वकील रखना ही पड़ेगा, जबकि अपना मुकदमा बिना वकील के ही लड़ने का हर नागरिक को अधिकार है। वकील रखने के बाद भी वादी या प्रतिवादी यह नहीं समझ पाता है कि उसका वकील मुकदमा सही ढंग से लड़ रहा है या नहीं।


      हिंदी दिल्ली की प्रथम राजभाषा है। दिल्ली के निचली अदालतों और जिला अदालतों में हिंदी भाषा के प्रयोग की अनुमति है। दिल्ली हाई कोर्ट में जब कोई मुकदमा जिला अदालत के बाद अपील के रूप में आता है तो मुकदमे से संबंधित निर्णय व अन्य दस्तावेजों के अंग्रेजी अनुवाद में समय और धन का अपव्यय होता है। वैसे ही बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान हाई कोर्ट के बाद जब कोई मुकदमा सुप्रीम कोर्ट में आता है तो भी अंग्रेजी अनुवाद में समय और धन की बर्बादी होती है। प्रत्येक हाई कोर्ट में यदि एक-एक भारतीय भाषा के प्रयोग की भी अगर अनुमति हो जाए तो हाई कोर्ट तक अनुवाद की समस्या पूरे देश में लगभग समाप्त हो जाएगी।


      अनुच्छेद 343 में कहा गया है कि संघ की राजभाषा हिंदी होगी। जबकि अनुच्छेद 351 के मुताबिक संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए और उसका विकास करे। प्रगति और भाषा क्या स्वाधीनता का अर्थ केवल 'यूनियन जैक' के स्थान पर 'तिरंगा झंडा' फहरा लेना है अथवा सितम्बर मास में हिंदी दिवस मनाना या पखवाड़ा आयोजित करना है। कहने के लिए भारत विश्व का सबसे बड़ा प्रजातंत्र है, परंतु जहां जनता को अपनी भाषा में न्याय पाने का हक नहीं है, वहां प्रजातंत्र कैसा? दुनिया के तमाम उन्नत देश इस बात के प्रमाण हैं कि कोई भी राष्ट्र विदेशी भाषा में काम करके उन्नति नहीं कर सकता। प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से विश्व के वही देश अग्रणी हैं, जो अपनी जनभाषा में काम करते हैं और वे देश सबसे पीछे हैं, जो विदेशी भाषा में काम करते हैं। विदेशी भाषा में उन्हीं अविकसित देशों में काम होता है, जहां का बेईमान अभिजात वर्ग विदेशी भाषा को शोषण का हथियार बनाता है और सामाजिक-आर्थिक विकास के अवसरों में अपना पूर्ण आरक्षण बनाए रखना चाहता है। किसी भी तर्क से यह बात गले नहीं उतर सकती की अपनी मात्रभाषा के मुकाबले विदेशी भाषा से हमारा जीवन आसान हो सकता है, विकास और सम्रदि ज्यादा हो सकती है तथा कुल मिलकर उससे भारत का कल्याण हो सकता है.


      निवेदन है कि दिल्ली उच्च न्यायालय में हिंदी में भी कार्यवाही की व्यवस्था की जाए और जनता को अपनी भाषा में न्याय पाने का हक़ सुनिश्चित किया जाए।

      भवदीय,

      सूरज प्रकाश मनचंदा
      अध्यक्ष, प्रकाश इंडिया

      C-2/35 B, केशव पुरम,
      दिल्ली – 110035
      Tel: 011-27195251
      Mob: 09891827669


      मेरा भारत महान नहीं..., ये दोष मेरा है.
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