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WEED

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  • Raju Titus
    प्रिय मित्र, कुदरत मे खरपतवार नाम(Weed) की कोई चीज नहीं होती है.
    Message 1 of 2 , May 7, 2010
      प्रिय मित्र,
      कुदरत मे खरपतवार नाम(Weed) की कोई चीज नहीं होती है. ये तो किसान की भ्रान्ति
      है . वो हजारो साल से से इसे मारने मे लगा है किन्तु ये तो नही वरन अब किसान ही
      मिटने लगे हैं. क़ुदरत का नियम है की वो हमेशा अपनी धरती को हरयाली से ढँक कर
      रखना चाहती है किन्तु हम लोग इस ढकाव को रहने नहीं देते हैं..इस लिय हर साल ये
      कठिन होती जाती है. किसान धरती पर से सब कुछ मिटा कर केवल वही रखना चाहता है
      जो वो चाहता है इसलिए और जो कुछ भी उसकी फसल के साथ पैदा होता है उसे वो
      खरपतवार समझ कर मारता रहता है.
      हम भी कुदरती खेती करने से पहले यही करते रहते थे इस लिए हमारे खेत काँस घास
      से भर गए थे.जिसकी जड़ें बीस से तीस फीट तक की गहराई तक चली गयीं थी ये घास
      फूलों और जड़ों की गठान से पनपती हैं.खेती मे की जारही जमीन की जुताई ,चराई,
      कटाई या जलाने से ये तेजी से पनपती है. हमारे खेतों मे ये इतनी फैल गयी थी
      की एक इंच जमीन भी नहीं बची थी. हमने इस को मिटने के लिए जितने उपाय अमल मे
      लाये वे सभी कम नहीं आये वरन ये घास और अधिक फैल गयी. किन्तु जैसे ही हमने जमीन
      की जुताई बंद कर इस घास मे कुदरती खेती करना शुरू कर दिया ये अपने आप चली गयी.
      हम इस घास मे बीजों को बिखरा कर इसे काटकर वंही जहाँ का तंहा फैला देते थे.
      १९८८ मे जब फुकुओकाजी हमारे फार्म पर आये थे उन्होंने इसे बहुत सराहा था.
      हमारा मानना है की हमें खरपतवार से दोस्ती करना सीखना चाहिए. इस मे ही भलाई है.
      क़ुदरत मे खरपतवार कुछ नहीं होता है.
      राजू.


      Dear friends,
      In nature, there is no such thing as weed. This is an illusion of the
      farmer. He kept on killing them(weed) for thousands of years and now he
      himself is getting killed. Nature's rule is to keep the earth always covered
      with greenery, but we try to interfere and remove this cover. Due to this
      they become stronger and stronger each passing year. The farmer wants only
      those plants to stay which he thinks are beneficial and eliminates every
      other plant and animal from his farm by thinking of them as weeds and pests.
      Before I started natural farming, I too tried to eliminate the weeds. This
      resulted in my farm getting filled with 'kaans' grass. This grass has roots
      as deep as 20 to 30 feet and it spreads very fast by the medium of flowering
      and roots. It's spread is hastened by acts such as tilling, grazing, cutting
      and burning. It spread to every inch of my land. All the methods I tried to
      control this grass resulted in failure and moreover it strengthened the
      spread of grass. But, when I stopped tilling my land and started natural
      farming in my farm, the grass disappeared all by itself over time. I used to
      broadcast seeds in this grass and then used to cut and leave the grass
      insitu. When Mr.Fukuoka visited my farm in 1988, he appreciated this act
      very much. My belief is that we must befriend weeds. There is immense
      benefit in this and there is no such thing as weed in nature.
      (Translated by Yugandher)

      --Raju



      --
      Raju Titus. Hoshangabad.India.
      +919179738049.
      http://picasaweb.google.com/rajuktitus


      [Non-text portions of this message have been removed]
    • Guna...
      Well Said Mr. Raju sir. My sincere salute/ Guna.Srinivas 2010/5/8 Raju Titus ... [Non-text portions of this message have been removed]
      Message 2 of 2 , May 7, 2010
        Well Said Mr. Raju sir.

        My sincere salute/

        Guna.Srinivas

        2010/5/8 Raju Titus <rajuktitus@...>

        > प्रिय मित्र,
        > कुदरत मे खरपतवार नाम(Weed) की कोई चीज नहीं होती है. ये तो किसान की भ्रान्ति
        > है . वो हजारो साल से से इसे मारने मे लगा है किन्तु ये तो नही वरन अब किसान
        > ही
        > मिटने लगे हैं. क़ुदरत का नियम है की वो हमेशा अपनी धरती को हरयाली से ढँक कर
        > रखना चाहती है किन्तु हम लोग इस ढकाव को रहने नहीं देते हैं..इस लिय हर साल ये
        > कठिन होती जाती है. किसान धरती पर से सब कुछ मिटा कर केवल वही रखना चाहता है
        > जो वो चाहता है इसलिए और जो कुछ भी उसकी फसल के साथ पैदा होता है उसे वो
        > खरपतवार समझ कर मारता रहता है.
        > हम भी कुदरती खेती करने से पहले यही करते रहते थे इस लिए हमारे खेत काँस घास
        > से भर गए थे.जिसकी जड़ें बीस से तीस फीट तक की गहराई तक चली गयीं थी ये घास
        > फूलों और जड़ों की गठान से पनपती हैं.खेती मे की जारही जमीन की जुताई ,चराई,
        > कटाई या जलाने से ये तेजी से पनपती है. हमारे खेतों मे ये इतनी फैल गयी थी
        > की एक इंच जमीन भी नहीं बची थी. हमने इस को मिटने के लिए जितने उपाय अमल मे
        > लाये वे सभी कम नहीं आये वरन ये घास और अधिक फैल गयी. किन्तु जैसे ही हमने
        > जमीन
        > की जुताई बंद कर इस घास मे कुदरती खेती करना शुरू कर दिया ये अपने आप चली गयी.
        > हम इस घास मे बीजों को बिखरा कर इसे काटकर वंही जहाँ का तंहा फैला देते थे.
        > १९८८ मे जब फुकुओकाजी हमारे फार्म पर आये थे उन्होंने इसे बहुत सराहा था.
        > हमारा मानना है की हमें खरपतवार से दोस्ती करना सीखना चाहिए. इस मे ही भलाई
        > है.
        > क़ुदरत मे खरपतवार कुछ नहीं होता है.
        > राजू.
        >
        >
        > Dear friends,
        > In nature, there is no such thing as weed. This is an illusion of the
        > farmer. He kept on killing them(weed) for thousands of years and now he
        > himself is getting killed. Nature's rule is to keep the earth always
        > covered
        > with greenery, but we try to interfere and remove this cover. Due to this
        > they become stronger and stronger each passing year. The farmer wants only
        > those plants to stay which he thinks are beneficial and eliminates every
        > other plant and animal from his farm by thinking of them as weeds and
        > pests.
        > Before I started natural farming, I too tried to eliminate the weeds. This
        > resulted in my farm getting filled with 'kaans' grass. This grass has roots
        > as deep as 20 to 30 feet and it spreads very fast by the medium of
        > flowering
        > and roots. It's spread is hastened by acts such as tilling, grazing,
        > cutting
        > and burning. It spread to every inch of my land. All the methods I tried to
        > control this grass resulted in failure and moreover it strengthened the
        > spread of grass. But, when I stopped tilling my land and started natural
        > farming in my farm, the grass disappeared all by itself over time. I used
        > to
        > broadcast seeds in this grass and then used to cut and leave the grass
        > insitu. When Mr.Fukuoka visited my farm in 1988, he appreciated this act
        > very much. My belief is that we must befriend weeds. There is immense
        > benefit in this and there is no such thing as weed in nature.
        > (Translated by Yugandher)
        >
        > --Raju
        >
        >
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        > --
        > Raju Titus. Hoshangabad.India.
        > +919179738049.
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