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हमारा शरीर संसार का ही एक हिस्सा ह ै

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  • T C Mudgal
     हमारा शरीर संसार का ही एक हिस्सा है और संसार की वस्तुओं और
    Message 1 of 1 , May 3, 2012
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       हमारा शरीर संसार का ही एक हिस्सा है और संसार की वस्तुओं और
      व्यक्तियों के संगठन को ही हम परिस्थिति कहते हैं। परिस्थितियां दो प्रकार
      की होती है- अनुकूल और प्रतिकूल। दरअसल, जिन वस्तुओं और व्यक्तियों को आप
      चाहते है, जब वे आपको मिल जाते है, तो यह आपके लिए अनुकूल परिस्थिति
      कहलाती है। दूसरी ओर, यदि जिन वस्तुओं या व्यक्ति को पाने की आप इच्छा
      रखते है, वे नहीं मिल पाते है, तो यह आपके लिए प्रतिकूल परिस्थिति कहलाती
      है। सामान्य तौर पर स्वस्थ शरीर, पर्याप्त आय, समुचित सम्मान आदि को
      अनुकूल परिस्थिति का नाम दिया जाता है। वहीं, दुर्बल शरीर, कम आय, अपयश,
      अपमान आदि को प्रतिकूल परिस्थिति का नाम दिया जाता है।
      एकसमान महत्व : एक सामान्य इनसान की सोच के अनुसार, अनुकूल
      परिस्थितियां अच्छी होती है, जबकि प्रतिकूल परिस्थितियां बुरी होती है।
      वास्तव में, यह विचार सही नहीं हैं। साधना के दृष्टिकोण से अनुकूल और
      प्रतिकूल परिस्थितियों का एकसमान महत्व है जिस प्रकार देखने के लिए दोनों
      आंखों, सुनने के लिए दोनों कानों और चलने के लिए दोनों पैरों का महत्व
      होता है, उसी प्रकार दोनों प्रकार की परिस्थितियां मानव जीवन के लिए
      उपयोगी है। यदि इन दोनों परिस्थितियों का सदुपयोग किया जाए, तो दुख स्वत:
      समाप्त हो जाते है और आपको आनंद की अनुभूति होती है।
      सच तो यह है कि यदि इनसान प्रतिकूल परिस्थितियों से घबरा जाएगा, तो
      जीवन का सच्चा सुख उसे कभी-भी प्राप्त नहीं हो सकेगा। कहा भी गया है कि
      दुख के बाद ही सुख के सच्चे मोल का पता चलता है।
      समय का सदुपयोग : इनसान को विपरीत परिस्थितियों, यानी दुख में भी समय
      का सदुपयोग करना चाहिए। उदाहरण के लिए हम मीराबाई को देख सकते है।
      उन्होंने दुख और सुख दोनों परिस्थितियों में प्रभु का ध्यान करना नहीं
      छोड़ा! ध्यान रखें कि हमें ईश्वर को याद तो जरूर करना चाहिए, लेकिन बदले
      में उनसे संसार की कोई वस्तु कभी भी मांगनी ही नहीं चाहिए। साथ ही, हमें
      सभी व्यक्तियों के प्रति प्रेम-भाव भी रखना चाहिए।
      कहां हैं ईश्वर : ईश्वर हर जगह मौजूद है, लेकिन हम अपने पूजाघर या
      मन्दिर में उनकी मूर्ति को रखकर पूजा करते है। हम ईश्वर को कई नामों से
      पुकारते है, जैसे-श्रीराम, श्रीकृष्ण, राधा, सीता, रामेश्वरम, भोले शंकर,
      हनुमान मां दुर्गा, मां सरस्वती, मां पार्वती, मां लक्ष्मी आदि। दूसरी ओर,
      मंदिर के बाहर भी ईश्वर मौजूद हैं, वे है- आपके माता-पिता, भाई-बंधु,
      समाज-संसार के सभी मनुष्य और प्राणी। आवश्यकता है, तो सिर्फ उन्हे मन की
      आंखों से देखने की।
      डॉ. भीकमचन्द प्रजापति
       
      Thanks & Regards,
       
      T.C.Mudgal
      Rewari(Haryana)
      09466332527
       
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