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Re: [RadhaswamiDham] चलती चक् की देख के, दिया कम ाल ठठाए

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  • Surinder Yadav
    Dear Sanjay ji, RADHA SWAMI pls send me link , where i get sabdh sangah and can download it. I forget the link , from where i download 7 cd of sabdh .
    Message 1 of 3 , Nov 25, 2010
    • 0 Attachment
      Dear Sanjay ji, RADHA SWAMI pls send me link , where i get sabdh sangah and can download it. I forget the link , from where i download 7 cd of sabdh .

      thanks
      radha swami

      --- On Wed, 11/24/10, sanjay yadav <sanjoy_rao@...> wrote:

      From: sanjay yadav <sanjoy_rao@...>
      Subject: [RadhaswamiDham] चलती चक्की देख के, दिया कमाल ठठाए
      To: "Radhaswami Dham" <radhaswamidham@yahoogroups.com>
      Cc: "Radhaswami Satsangi" <radhasoamisatsangi@...>
      Date: Wednesday, November 24, 2010, 11:26 AM

       

      चलती चक्की देख कर, दिया कबीरा रोए।
      दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोए।।

      संसार की क्षणभंगुरता और जन्म-मृत्यु के पाटों के बीच में मनुष्य का नष्ट होना निश्चित है। कबीर दुखी थे, और श्रोता भी। ऐसे में संसार से विरक्ति होना स्वाभाविक है। लेकिन वहीं कबीर के पुत्र कमाल भी बैठे थे। पिता को सुनने के बाद बोले, मैंने भी एक दोहा रचा है। दोहा क्या था, कबीर की उस पहेली का उत्तर था,

      चलती चक्की देख कर, दिया कमाल ठठाय।
      कीले से जो लग रहा, सोई रहा बचाय।।

      पहला दोहा जीवन की अनित्यता के कारण ज्ञान से उपजा वैराग्य उपजाता है, लेकिन दूसरा आशा और आस्था का मार्ग दिखाता है। कबीर आस्थावान नहीं हैं। जो लिखता है कि 'कबीरा कूता राम का, मुतिया मेरो नाऊं। गले राम की जेवड़ी, जित खेंचे तित जाऊं।'

      उसके पास अपना अस्तित्व रहा ही कहां! पर कमाल ने जिस तरह रोते हुए कबीर को ठहाका मार कर हंसने का तोड़ बताया -वह अद्वितीय है।

      चक्की चलाते हुए एक हाथ से मंूठ पकड़ कर दूसरे हाथ से अनाज के दाने बीच में उपर से डाले जाते हैं। वही नीचे जाकर पाट के ऊपर फैल जाते हैं और पिस जाते हैं। पर कुछ दाने जो चक्की के कीले के साथ लगे रह जाते हैं, वे साबुत बच जाते हैं। आवागमन के दो पाटों के बीच आया जीव भी ऐसे ही पिसता है। मगर जो भक्ति की राह चल पड़ता है, भगवान के चरणों से लिपट जाता है, वह बच जाता है। 'बचना' क्या मृत्यु से मुक्त होना है? क्या काल के घोड़ों पर लगाम लगाई जा सकती है? पानी के बुलबुले जैसे इस जीवन को स्थायी बनाया जा सकता है? पल-पल शीर्ण होते शरीर को सदा तरोताजा रखा जा सकता है? इन सब सवालों के जवाब नकारात्मक हैं। ' बचने ' की भी एक विद्या है। अपने पूरे वजूद को ईश्वर के प्रति समर्पित करने से यह विद्या समझ में आती है। सब ओर से अपने को समेट कर एक के साथ जुड़ जाना ही इस ज्ञान का मूल मंत्र है। फिर जब पाठ पढ़ाने वाले कृष्ण हों , तो सब धर्मों को छोड़ कर उसी जगदगुरु की शरण में जाने से भक्त भयमुक्त हो सकता है।

      मृत्यु के भय से मुक्ति ही बचने का साधन है। दर्शन की भाषा में इसे निर्वाण , परम पद और अभय पद आदि कहा गया है। इस मनोदशा को पाने के लिए शरीर की सीमा में रहते हुए भी , काया के बंधनों से छूटा जा सकता है। काम , क्रोध , लोभ , मोह जैसे विकार शरीर के सहज स्वभाव में आते हैं। इनसे अपने को मुक्त करना जीते जी मुक्ति पाना है। कबीर ने इसी को ' जीवन मुक्ति ' कहा है। मरने के बाद जीव जहां जाता है , प्राण रहते वहीं पहुंचना सनातन लक्ष्य बन जाए। कबीर कहते हैं -

      अब मन उलटि सनातन हुवा
      तब जानि जब जीवत मुवा।
      पिंड परै जिब जैहै जहां
      जीवत ही लै राखो तहां।।

      इस भौतिक संसार में भी आस्थावान और शरणागति को ज्यादा सुखी - संतोषी देखा जाता है। प्राणलेवा बीमारियों के इलाज में कई बार ऐसे प्रयोग हुए हैं। आस्तिक और नास्तिक रोगियों को एक सी दवाइयां दी गईं। आस्थावान केवल घातक रोग के शिकंजे से निकल आए , उन में प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ी। दूसरी ओर नास्तिकों के स्वास्थ्य में मामूली सुधार हुआ।

      कीले से लगे रहकर ही इस सुख - दुखमय नश्वर संसार में शांति का जीवन मिल सकत ा है।


    • sanjay yadav
      Radhaswami Surinder Ji, I feel there are not much shabdhs on net as it requires much space on web. however please find the given link from where you can
      Message 2 of 3 , Nov 26, 2010
      • 0 Attachment
        Radhaswami Surinder Ji,

        I feel there are not much shabdhs on net as it requires much space on web. however please find the given link from where you can download shabdhs.

        http://www.4shared.com/audio/JcyHQcTK/04_DARD_DUKHI_KE_VIRHAN_BHARI.html

        Radhaswami

        --- On Thu, 25/11/10, Surinder Yadav <surenmohil@...> wrote:

        From: Surinder Yadav <surenmohil@...>
        Subject: Re: [RadhaswamiDham] चलती चक्की देख के, दिया कमाल ठठाए
        To: RadhaswamiDham@yahoogroups.com
        Date: Thursday, 25 November, 2010, 6:20 PM

         

        Dear Sanjay ji, RADHA SWAMI pls send me link , where i get sabdh sangah and can download it. I forget the link , from where i download 7 cd of sabdh .

        thanks
        radha swami

        --- On Wed, 11/24/10, sanjay yadav <sanjoy_rao@...> wrote:

        From: sanjay yadav <sanjoy_rao@...>
        Subject: [RadhaswamiDham] चलती चक्की देख के, दिया कमाल ठठाए
        To: "Radhaswami Dham" <radhaswamidham@yahoogroups.com>
        Cc: "Radhaswami Satsangi" <radhasoamisatsangi@...>
        Date: Wednesday, November 24, 2010, 11:26 AM

         

        चलती चक्की देख कर, दिया कबीरा रोए।
        दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोए।।

        संसार की क्षणभंगुरता और जन्म-मृत्यु के पाटों के बीच में मनुष्य का नष्ट होना निश्चित है। कबीर दुखी थे, और श्रोता भी। ऐसे में संसार से विरक्ति होना स्वाभाविक है। लेकिन वहीं कबीर के पुत्र कमाल भी बैठे थे। पिता को सुनने के बाद बोले, मैंने भी एक दोहा रचा है। दोहा क्या था, कबीर की उस पहेली का उत्तर था,

        चलती चक्की देख कर, दिया कमाल ठठाय।
        कीले से जो लग रहा, सोई रहा बचाय।।

        पहला दोहा जीवन की अनित्यता के कारण ज्ञान से उपजा वैराग्य उपजाता है, लेकिन दूसरा आशा और आस्था का मार्ग दिखाता है। कबीर आस्थावान नहीं हैं। जो लिखता है कि 'कबीरा कूता राम का, मुतिया मेरो नाऊं। गले राम की जेवड़ी, जित खेंचे तित जाऊं।'

        उसके पास अपना अस्तित्व रहा ही कहां! पर कमाल ने जिस तरह रोते हुए कबीर को ठहाका मार कर हंसने का तोड़ बताया -वह अद्वितीय है।

        चक्की चलाते हुए एक हाथ से मंूठ पकड़ कर दूसरे हाथ से अनाज के दाने बीच में उपर से डाले जाते हैं। वही नीचे जाकर पाट के ऊपर फैल जाते हैं और पिस जाते हैं। पर कुछ दाने जो चक्की के कीले के साथ लगे रह जाते हैं, वे साबुत बच जाते हैं। आवागमन के दो पाटों के बीच आया जीव भी ऐसे ही पिसता है। मगर जो भक्ति की राह चल पड़ता है, भगवान के चरणों से लिपट जाता है, वह बच जाता है। 'बचना' क्या मृत्यु से मुक्त होना है? क्या काल के घोड़ों पर लगाम लगाई जा सकती है? पानी के बुलबुले जैसे इस जीवन को स्थायी बनाया जा सकता है? पल-पल शीर्ण होते शरीर को सदा तरोताजा रखा जा सकता है? इन सब सवालों के जवाब नकारात्मक हैं। ' बचने ' की भी एक विद्या है। अपने पूरे वजूद को ईश्वर के प्रति समर्पित करने से यह विद्या समझ में आती है। सब ओर से अपने को समेट कर एक के साथ जुड़ जाना ही इस ज्ञान का मूल मंत्र है। फिर जब पाठ पढ़ाने वाले कृष्ण हों , तो सब धर्मों को छोड़ कर उसी जगदगुरु की शरण में जाने से भक्त भयमुक्त हो सकता है।

        मृत्यु के भय से मुक्ति ही बचने का साधन है। दर्शन की भाषा में इसे निर्वाण , परम पद और अभय पद आदि कहा गया है। इस मनोदशा को पाने के लिए शरीर की सीमा में रहते हुए भी , काया के बंधनों से छूटा जा सकता है। काम , क्रोध , लोभ , मोह जैसे विकार शरीर के सहज स्वभाव में आते हैं। इनसे अपने को मुक्त करना जीते जी मुक्ति पाना है। कबीर ने इसी को ' जीवन मुक्ति ' कहा है। मरने के बाद जीव जहां जाता है , प्राण रहते वहीं पहुंचना सनातन लक्ष्य बन जाए। कबीर कहते हैं -

        अब मन उलटि सनातन हुवा
        तब जानि जब जीवत मुवा।
        पिंड परै जिब जैहै जहां
        जीवत ही लै राखो तहां।।

        इस भौतिक संसार में भी आस्थावान और शरणागति को ज्यादा सुखी - संतोषी देखा जाता है। प्राणलेवा बीमारियों के इलाज में कई बार ऐसे प्रयोग हुए हैं। आस्तिक और नास्तिक रोगियों को एक सी दवाइयां दी गईं। आस्थावान केवल घातक रोग के शिकंजे से निकल आए , उन में प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ी। दूसरी ओर नास्तिकों के स्वास्थ्य में मामूली सुधार हुआ।

        कीले से लगे रहकर ही इस सुख - दुखमय नश्वर संसार में शांति का जीवन मिल सकत ा है।



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