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#13939 From: Rahul Upadhyaya <upadhyaya@...>
Date: Wed Dec 9, 2009 7:39 pm
Subject: merii bhuukh - मेरी भूख
upadhyaya
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(online link: http://tinyurl.com/rahulpoems)    

मेरी भूख
राहुल उपाध्याय

हाथ में मेरे पचासों लकीरें
एक भी उनमें नहीं है लकी रे

करता न खिदमत
न सहता हुकूमत
एक जो किस्मत होती भली रे

खा के भी हलवा
खा के भी पूड़ी
भूख ये मेरी मिटती नहीं रे

दिखता है जोगी
होती जलन है
खा के भी सूखी रहता सुखी रे

कहता है जोगी
सुन बात मेरी
ना तू अनलकी है ना मैं लकी रे

दूजे की प्लेट पे
आँख जो गाड़े
इंसां वही सदा रहता दुखी रे

सोने की, चांदी की
थाल को छोड़ो
पेट तो मांगे जो उगाती ज़मीं रे

सिएटल ।
9 दिसम्बर 2009
================
लकी = lucky
अनलकी = unlucky
A picture may be worth a thousand words. But mere wordscan inspire millions




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#13938 From: Rahul Upadhyaya <upadhyaya@...>
Date: Thu Nov 26, 2009 3:28 pm
Subject: janm - जन्म
upadhyaya
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जन्म
राहुल उपाध्याय

जन्म के पीछे कामुक कृत्य है
यह एक सर्वविदित सत्य है

कभी झुठलाया गया
तो कभी नकारा गया
हज़ार बार हमसे ये सच छुपाया गया

कभी शिष्टता के नाते
तो कभी उम्र के लिहाज से
'अभी तो खेलने खाने की उम्र है
क्या करेंगे इसे जान के?'

सोच के मंद मुस्करा देते थे वो
रंगीन गुब्बारे से बहला देते थे
वो

बढ़े हुए तो सत्य से पर्दे उठ गए
और बच्चों की तरह हम रुठ गए
जैसे एक सुहाना सपना टूट गया
और दुनिया से विश्वास उठ गया

ये मिट्टी है, मेरा घर नहीं
ये पत्थर है, कोई ईश्वर नहीं
ये देश है, मातृ-भूमि नहीं
ये ब्रह्मांड है, ब्रह्मा कहीं
पर नहीं

एक बात समझ में आ गई
तो समझ बैठे खुद को ख़ुदा
घुस गए 'लैब' में
शांत करने अपनी क्षुदा

हर वस्तु की नाप तोल करे
न कर सके तो मखौल करे

वेदों को झुठलाते है हम
ईश्वर को नकारते है हम
तर्क से हर आस्था को मारते हैं
हम

ईश्वर सामने आता नहीं
हमें कुछ समझाता नहीं

कभी शिष्टता के नाते
तो कभी उम्र के लिहाज से
'अभी तो खेलने खाने की उम्र है
क्या करेंगे इसे जान के?'

बादल गरज-बरस के छट जाते हैं
इंद्रधनुष के रंग बिखर जाते है

सिएटल,
26 नवम्बर 2007
(मेरा जन्म दिन)
A picture may be worth a thousand words. But mere wordscan inspire millions




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#13937 From: Rahul Upadhyaya <upadhyaya@...>
Date: Fri Nov 20, 2009 7:23 am
Subject: maNiyaa.N - मणियाँ
upadhyaya
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(online link: http://tinyurl.com/rahulpoems)
मणियाँ
राहुल उपाध्याय
 
फूलों की बगिया ज्यों किश्तों
में खिलती है
इंसां की किस्मत भी किश्तों में
जगती है

भला छाते ही बादल कहीं बरखा भी
होती है?
होने-बरसने में यारो इक उम्र
गुज़रती है

मिलना-बिछड़ना, व हँसना व रोना
इन के ही मिश्रण से शख़्सियत
निखरती है

जब आता है संकट, हम खुद को परखते
हैं
और मूल्यों-विश्वासों की
दुनिया सँवरती है

जब होता है मन का, तो लगता है
अच्छा
जब मन का न हो, तभी तो मणियाँ
निकलती हैं

सिएटल
19 नवम्बर 2009 
A picture may be worth a thousand words. But mere wordscan inspire millions





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#13936 From: Rahul Upadhyaya <upadhyaya@...>
Date: Tue Nov 17, 2009 7:10 am
Subject: merii kalam - मेरी कलम
upadhyaya
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(online link: http://tinyurl.com/rahulpoems)  
मेरी कलम
राहुल उपाध्याय
 
कोई पूछे कि न पूछे
ये कलम मुझको बुलाती है
हर मोड़ पे, हर हाल में
ये गीत सुनाती है
 
शमा जलती है, बुझती है
मिट जाती है जल कर
दिनकर आ के, जगमगा के
चला जाता है थक कर
इक कलम ही है
जो दु:ख-सुख में
मेरा साथ निभाती है
 
ताज हो, तख्त हो, दौलत हो
ज़माने भर की
उस पे बंदिश कि
न कहो बात अपने मन की
ऐसी ज़िंदगी भी कहीं
ज़िंदगी कही जाती है
 
कोई पक्षपात करे, द्वेष करे
जाल बिछाए
कोई नेता हो, अभिनेता हो
या लाख कमाए
सब के वादों को, इरादों को
ये साफ दिखाती है
 
कोई रूठे, कोई फूले
या कोई आँख दिखाए
बन के यमदूत भी
'गर आप मुझे लाख डराए
ये न रूकी है
न रुकती है
न रोकी जाती है
 
सिएटल
16 नवम्बर 2009 
A picture may be worth a thousand words. But mere wordscan inspire millions




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#13935 From: Rahul Upadhyaya <upadhyaya@...>
Date: Tue Nov 10, 2009 12:09 am
Subject: देख तेरे NRI की हालत
upadhyaya
Offline Offline
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(online link: http://tinyurl.com/rahulpoems)
देख तेरे एन-आर-आई की हालत
राहुल उपाध्याय
 
देख तेरे एन-आर-आई की हालत
क्या हो गई भगवान
कितना बदल गया शैतान
कितना बदल गया शैतान
 
हंस की चाल कौआ ज्यों चलता
मूँछ मुड़ा बंदा ये विचरता
खान-पान, परिधान ये बदले
बोल-चाल व नाम भी बदले
बदले ये पहचान
 
अपनी धरोहर न अपनाना चाहे
दूर-दूर उससे रहना चाहे
भूल चुका जो अपनी ज़ुबाँ को
मान न दे जो अपनी माँ को
एन-आर-आई वो संतान
 
पढ़ा लिखा के देश ने सींचा
फल वो पाए जो दे दे वीसा
ऐसी कैसी कौम ये ईश्वर
देश की निंदा करे निरंतर
कहे भारत श्मशान
 
जहाँ भी देखे रुपया-पैसा
वहीं पे डाले अपना डेरा
धन माया का है वो पुजारी
सूट में लेकिन लगे भिखारी
जिसमें नहीं स्वाभिमान
 
बन के मेहमां देश में आए
एक भी दमड़ी खर्च न पाए
तरह-तरह की बात बनाए
अपने जहाँ के गीत वो गाए
गाए गौरों के गुणगान
 
सुख-सुविधा का इतना आदी
बुरी लगे उसे अपनी माटी
माँ के हाथ का खा ना पाए
पानी हलक से उतर ना पाए
करे तुरंत प्रस्थान
 
सिएटल |   425-898-9325  425-898-9325    425-898-9325 
425-898-9325
31 अक्टूबर 2009
(प्रदीप से क्षमायाचना सहित)
 
पैरोडियाँ और भी हैं:
	 1. हाय! क्या चीज है एन-आर-आई भी
	 2. भारत छोड़ो आंदोलन
	 3. आप जाने की ज़िद न करो
	 4. मैं कायर तो नहीं
	 5. हमने देखी थी
	 6. घर छोड़ के हम आए हैं
	 7. मंज़र हिंदुस्तान के
	 8. आपने कभी एन-आर-आई देखा है?
	 9. मैंने पूछा एन-आर-आई से
	 10. एन-आर-आई
	 11. मिलते ही dollar दिल हुआ दीवाना US
का
	 12. आ लौट के आजा NRI
	 13. क्या हुआ तेरा वादा, वो क़सम वो
इरादा
	 14. अगर एन-आर-आई, तुमको पहचान
जाते
	 15. ऐ दौलत तेरे बंदे हम
	 16. NRI का सफ़र

और कुछ कविताएँ भी:
	 1. मैं अपनी माँ से दूर
	 2. वापसी पे मनते दीपोत्सव नहीं
	 3. मुझे सफ़ाई पसंद है
	 4. मेरी परीक्षा ले कर तो देखो
	 5. खुशहाली की नई मिसाल देखिए
	 6. दूर के मुसाफ़िर वापसी
	 7. मर्ज़
	 8. मैं आरगेनिक नहीं हूँ
	 9. भूलते नहीं हम
	 10. वीसा से वीसा तक
	 11. कलंक
	 12. वतन और वेतन
	 13. प्रतिभा पलायन
	 14. कामयाबी
	 15. दूर के मुसाफ़िर

A picture may be worth a thousand words. But mere wordscan inspire millions




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#13934 From: Rahul Upadhyaya <upadhyaya@...>
Date: Fri Nov 6, 2009 8:27 am
Subject: jahaa.N huu.N mai.n - जहाँ हूँ मैं वहीं उसका ठिकाना है
upadhyaya
Offline Offline
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(online link: http://tinyurl.com/rahulpoems)
जहाँ हूँ मैं वहीं उसका ठिकाना
है
राहुल उपाध्याय
 
जहाँ से हम आए हैं
वहीं हमें जाना हैं
ज़मीं से आए हैं
ज़मी में समाना है
 
रंगीं हो पत्ते
या काले हो बादल
अंत तो सभी का
वही पुराना है
 
बड़े से आसमां में
मैं ढूंढता था जिसको
टेका जो माथा तो
उसे यहीं पे जाना है

अब गली-गली हाथ फैलाए
मैं भीख मांगूँगा नहीं
क्योंकि कदमों तले मेरे
गड़ा खजाना है
 
'गर होता वो उपर
तो सोचो आस्ट्रेलिया का क्या
होता?
जहाँ हूँ मैं
वहीं उसका ठिकाना है
 
सिएटल | 425-898-9325
6 नवम्बर 2009
A picture may be worth a thousand words. But mere wordscan inspire millions





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#13933 From: prakash yadav nirbhik <nirbhik_prakash@...>
Date: Tue Oct 27, 2009 2:08 pm
Subject: Invitation to connect on LinkedIn
nirbhik_prakash
Offline Offline
Send Email Send Email
 
LinkedIn
------------




anubhuti,

I'd like to add you to my professional network on LinkedIn.

- prakash yadav

Accept prakash yadav nirbhik's invite:
https://www.linkedin.com/e/isd/823176884/aKdv_b4s/




------
(c) 2009, LinkedIn Corporation



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#13932 From: kusum sinha <kusumsinha2000@...>
Date: Tue Oct 27, 2009 12:57 pm
Subject: Re: NRI - हाय! क्या चीज है एन-आर-आई भी
kusumsinha2000
Offline Offline
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kya bat hai rahul ji lajwab bahut sundar bahut khub
kusum

--- On Tue, 10/27/09, Rahul Upadhyaya <upadhyaya@...> wrote:

From: Rahul Upadhyaya <upadhyaya@...>
Subject: [anubhuti-hindi] NRI - हाय! क्या चीज है
एन-आर-आई भी
To: "Anubhuti Hindi Yahoogroup" <anubhuti-hindi@yahoogroups.com>
Date: Tuesday, October 27, 2009, 2:38 AM






 





                   (online link: http://tinyurl. com/rahulpoems)

हाय! क्या चीज है एन-आर-आई भी

राहुल उपाध्याय

 

नाम भी, काम भी, कमाई भी

हाय! क्या चीज है एन-आर-आई भी

 

इसी को शायद कहते हैं ख़ुदा की
नेमत

कि केक खाई भी और केक बचाई भी

 

बात-बात में ले आते हैं देश की
बात

कभी करते हैं बड़ाई तो कभी बुराई
भी

 

शाने-वतन में है कुछ इनका भी हाथ

कभी बढ़ाई तो कभी घटाई भी

 

कल तलक जो थे बाप-दादा के दुश्मन

आज उन्हीं के बन बैठे घर-जमाई भी

 

भूख बढ़ती है तो बढ़ती ही चली जाती
है

जेब में है लाख मगर छूटती नहीं
एक पाई भी



शौच का ढंग जो बदला तो बदली सोच
भी साथ

हाय किस मिट्टी का बना है
एन-आर-आई भी

 

कैसा भावुक है ये एन-आर-आई यारो

कभी देता है मुझे गाली तो कभी
बधाई भी

 

सिएटल | 425-898-9325

26 अक्टूबर 2009

(फ़िराक गोरखपुरी से क्षमायाचना
सहित) 

A picture may be worth a thousand words. But mere wordscan inspire millions



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#13931 From: Rahul Upadhyaya <upadhyaya@...>
Date: Tue Oct 27, 2009 6:38 am
Subject: NRI - हाय! क्या चीज है एन-आर-आई भी
upadhyaya
Offline Offline
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(online link: http://tinyurl.com/rahulpoems)
हाय! क्या चीज है एन-आर-आई भी
राहुल उपाध्याय
 
नाम भी, काम भी, कमाई भी
हाय! क्या चीज है एन-आर-आई भी
 
इसी को शायद कहते हैं ख़ुदा की
नेमत
कि केक खाई भी और केक बचाई भी
 
बात-बात में ले आते हैं देश की
बात
कभी करते हैं बड़ाई तो कभी बुराई
भी
 
शाने-वतन में है कुछ इनका भी हाथ
कभी बढ़ाई तो कभी घटाई भी
 
कल तलक जो थे बाप-दादा के दुश्मन
आज उन्हीं के बन बैठे घर-जमाई भी
 
भूख बढ़ती है तो बढ़ती ही चली जाती
है
जेब में है लाख मगर छूटती नहीं
एक पाई भी

शौच का ढंग जो बदला तो बदली सोच
भी साथ
हाय किस मिट्टी का बना है
एन-आर-आई भी
 
कैसा भावुक है ये एन-आर-आई यारो
कभी देता है मुझे गाली तो कभी
बधाई भी
 
सिएटल | 425-898-9325
26 अक्टूबर 2009
(फ़िराक गोरखपुरी से क्षमायाचना
सहित) 
A picture may be worth a thousand words. But mere wordscan inspire millions





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#13930 From: Rahul Upadhyaya <upadhyaya@...>
Date: Thu Oct 22, 2009 6:55 am
Subject: H1 - एच-वन से भरी मेरी सी-वी
upadhyaya
Offline Offline
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(online link: http://tinyurl.com/rahulpoems)
एच-वन से भरी मेरी सी-वी
राहुल उपाध्याय
 
एच-वन से भरी मेरी सी-वी
मजबूर करे पीसने के लिए
पागल सा भटकता रहता हूँ
सही दाम पे मैं बिकने के लिए
 
मिलियन्स बनाउँगा मैं भी कभी
मैं भी अमीर कहलाऊँगा
हर ज़रूरत जब होगी पूरी
तब लौट के घर मैं जाऊँगा
घर बार सभी मैं तजता हूँ
सपनों के पीछे जगने के लिए
 
निर्धन की तरह मैं रहता हूँ
पाई-पाई मैं गिनता हूँ
फ़्री में कोई कुछ भी बाँटे
मैं हाथ फ़ैलाए फिरता हूँ
आईस-क्रीम का एक स्कूप ही काफ़ी
है
घंटों लम्बी लाईन में लगने के
लिए
 
सिएटल |  425-898-9325  425-898-9325         
21 अक्टूबर 2009
(इंदीवर से क्षमायाचना सहित)
================================
एच-वन = H1; सी-वी = CV = Curriculum Vitae
मिलियन्स = millions; फ़्री = free
आईस-क्रीम = ice-cream; स्कूप = scoop; लाईन =
line

A picture may be worth a thousand words. But mere wordscan inspire millions





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#13929 From: Rahul Upadhyaya <upadhyaya@...>
Date: Wed Oct 21, 2009 5:43 am
Subject: miyaad - मियाद
upadhyaya
Offline Offline
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(online link: http://tinyurl.com/rahulpoems)
शुभकामनाओं की मियाद
राहुल उपाध्याय
 
साल दर साल
मन में उठता है सवाल
शुभकामनाओं की मियाद
क्यूं होती है बस एक साल?
 
चलो इसी बहाने
पूछते तो हो
एक दूसरे का हाल
साल दर साल
जब जब आता नया साल
 
A picture may be worth a thousand words. But mere wordscan inspire millions





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#13928 From: pawan kumar <bhramarkumar@...>
Date: Tue Oct 20, 2009 5:39 pm
Subject: माँ ! तुझमे और उसमे बहुत अंतर था ||
bhramarkumar
Offline Offline
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माँ !
तुझमे और उसमे
बहुत अंतर था ॥
 
 
तुम्हारी सूखी हुई ,
दुबली हडिइया भी
कभी चुभी नहीं मुझे ,
बल्कि मर्मस्पर्शी
प्रेम में लिपटी हुई लगी ॥
 
 
तुम्हारा मुझे
वो नंगे पांव
धूप मे खड़ा कर देना
कभी रूला नहीं पाया मुझे
क्योंकि
उसके बाद
लिपटा लेती थी तुम मुझको गले से
॥
 
 
और तुम्हारा
रोज रात को पापा से
झगड़ जाना
मेरे वर्तमान और भविष्य के लिए।
मुझे सजाता रहा
और इंसान बनाता रहा ।
 
 
लेकिन वो
फूल से दिखनी वाली
जो खुद तू मेरे लिए
लेकर आई
चुभो गई अपने सारे
अस्त्र ......!!
 
 
और अब मै असहाय
रक्त से लथ-पथ
मरूभूमि में पड़ा
ढूंढ्ता हूँ फिर तुझे
ओ माँ ॥




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#13927 From: Vinay k Joshi <vinaykantjoshi@...>
Date: Sat Oct 17, 2009 6:23 pm
Subject: शुभकामनाएँ
vinaykantjoshi
Offline Offline
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आप सभी को दीपावली की हार्दिक
शुभकामनाएँ |
saadar,
vinay k joshi



       From cricket scores to your friends. Try the Yahoo! India Homepage!
http://in.yahoo.com/trynew

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#13926 From: Anoop Bhargava <anoop_bhargava@...>
Date: Sat Oct 17, 2009 7:40 am
Subject: शुभ दीपावली
anoop_bhargava
Offline Offline
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मधुर मधुर दीप जले
हर क्षण में ज्योति पले
तिमिर सभी गले
दीप जले
घर आंगन द्वार डगर
जगर मगर नगर नगर
अपने सब मिलें गले
बैर सब टले
दीप जले

खुशियों की थाली हो
हर दिन दीवाली हो
घने कल्पवृक्ष तले
साल नया चले
दीप जले

 


 
 

रजनी-अनूप-अनुभव-कनुप्रिया
भार्गव
                                        \
                                        \
                                        \
                                        \
                                        \
                                        \
                                        \
                                        
                                           
                                           
                                           
कविता - पूर्णिमा वर्मन

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#13925 From: "ramadwivedi" <ramadwivedi@...>
Date: Fri Oct 16, 2009 10:16 pm
Subject: Happy Diwali
ramadwivedi
Offline Offline
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WISH YOU A VERY VERY HAPPY AND PROSPEROUS DIWALI

        -Dr.Rama Dwivedi

#13924 From: "ramadwivedi" <ramadwivedi@...>
Date: Fri Oct 16, 2009 5:01 pm
Subject: Happy deepawli
ramadwivedi
Offline Offline
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&#2360;&#2349;&#2368; &#2350;&#2367;&#2340;&#2381;&#2352;&#2379;&#2306;
&#2325;&#2379; &#2342;&#2368;&#2346;-&#2346;&#2352;&#2381;&#2357; &#2325;&#2368;
&#2309;&#2344;&#2375;&#2325;&#2366;&#2344;&#2375;&#2325;
&#2361;&#2366;&#2352;&#2381;&#2342;&#2367;&#2325;
&#2358;&#2369;&#2349;&#2325;&#2366;&#2350;&#2344;&#2366;&#2319;&#2305;
&#2319;&#2357;&#2306; &#2348;&#2343;&#2366;&#2312;

          - &#2337;&#2366;.&#2352;&#2350;&#2366;
&#2342;&#2381;&#2357;&#2367;&#2357;&#2375;&#2342;&#2368;

        http://ramadwivedi.wordpress.com

#13923 From: Rahul Upadhyaya <upadhyaya@...>
Date: Fri Oct 16, 2009 8:02 am
Subject: kaamanaa - कामना
upadhyaya
Offline Offline
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कामना
राहुल उपाध्याय


अमीर और गरीब, राजा और रंक
सबके सब रह जाते हैं दंग
विधि का विधान कभी न रुका है
इसके आगे हर मस्तक झुका है
भर दे 'गर सागर कोई रो रो के
जानेवाले फिर भी न जाते हैं
रोके
 
रात और दिन, सुबह और शाम
सूझता है बस काम ही काम
अपनो को छोड़ अपनाते हैं धंदे
थोड़ा सा ज्यादा अगर वो धन दे
जोड़ते हैं सोना चार चार पाई कर
जबकि सोना है बस एक चारपाई पर
 
पूरब और पश्चिम, उत्तर और
दक्षिण
हम सब है एक, नहीं हैं भिन्न
तब तक ही बस दिल हमारा धड़के
जब तक है साथ सिर हमारे धड़ के
बात बात पर 'गर हम भड़के
मुद्दे उठेंगे नए एक रण के

क्या मिलेगा दुनिया को लड़ के?
गरीबों ने बस गवाएं हैं लड़के
ईश्वर से करे हम ऐसी कामना
बुरा हो हमसे कोई काम ना
आओ चलो कसम हम ले
आदमी आदमी पे करे न हमले

बने हम तुम कुछ ऐसे गमले
जो खुशीयां दे और हर हर गम ले
मेहमां हैं हम पल दो पल के
हँसए-हँसाए जब तक खुली हैं
पलकें
आँसू किसी के कभी न छलके
करे न काम कपट और छल के

हेंकड़ी न हांके ताकत और बल की
शरण में जाए ईश्वर के बल्कि

 
A picture may be worth a thousand words. But mere wordscan inspire millions





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#13922 From: Rahul Upadhyaya <upadhyaya@...>
Date: Sat Oct 10, 2009 1:00 am
Subject: manamohak - मनमोहक दृश्य
upadhyaya
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मनमोहक दृश्य
राहुल उपाध्याय
 
बहारें रंग भरती हैं
कोहरा रंग चुराता है
भरने-लुटने के संवाद में
पत्तियों का रूप मनोरम हो जाता
है
 
बावला बाबुल
वात्सल्य का अंधा
समझ नहीं कुछ पाता है
शाख बढ़ा कर
हाथ हिला कर
शू-शू करता जाता है
 
नटखट कोहरा
बाज न आए
इत-उत मंडराता है
कभी इधर से
कभी उधर से
पत्तियों को छूता जाता है
 
देख कुदरत की ऐसी झाँकी
मन मोहित हो जाता है
कवि हृदय कविता लिखता है
भँवरा गुन-गुन गुण गाता है
 
सिएटल | 425-898-9325
9 अक्टूबर 2009
A picture may be worth a thousand words. But mere wordscan inspire millions





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#13921 From: Rahul Upadhyaya <upadhyaya@...>
Date: Wed Oct 7, 2009 11:33 pm
Subject: jiit gayaa bhai jiit gayaa - जीत गया भई जीत गया
upadhyaya
Offline Offline
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(online link: http://tinyurl.com/rahulpoems)

जीत गया भई जीत गया
राहुल उपाध्याय
 
जीत गया भई जीत गया
इंडिया वाला जीत गया
गोरों की जमात में
बंदा अपना दिख गया
 
नाम ही अपने कुछ ऐसे हैं
कि दूर से पहचान लेते हैं
ये दक्षिण का है
ये अहिंदी है
बिन बोले ताड़ लेते हैं
 
एक बार फिर वही जीता है
जो अंग्रेज़ी बोलना सीख गया
 
सीख गया भई सीख गया
इंडिया वाला सीख गया
आत्मसम्मान खो के वो
सम्मान पाना सीख गया
 
भाषा से विचार बनें
और विचार से आचार
जो माँ की बोली बोल न पाए
वो माँ से करेगा क्या प्यार
 
सोने चाँदी के टुकड़ों पे
माँ का दूध फिर आज बिक गया
 
बिक गया भई बिक गया
इंडिया वाला बिक गया
गरीबी और बेरोज़गारी में
माँ से माँ का लाल छीन गया
 
ज्ञान-विज्ञान की भाषा में
कहीं दिल की बात भी होती है?
लाख चांदनी रात में हो
रात तो रात ही होती है
 
वो जब समझेगा तब समझेगा
आज तो बंदा हिट गया
 
हिट गया भई हिट गया
इंडिया वाला हिट गया
दूर-दराज की रोशनी पे
नूर अपना मर-मिट गया
सिएटल | 425-898-9325
7 अक्टूबर 2009
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#13920 From: Rahul Upadhyaya <upadhyaya@...>
Date: Mon Oct 5, 2009 6:19 am
Subject: karavaa chauth - करवा चौथ
upadhyaya
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करवा चौथ 
राहुल उपाध्याय
 
भोली बहू से कहती हैं सास
तुम से बंधी है बेटे की सांस
व्रत करो सुबह से शाम तक
पानी का भी न लो नाम तक
 
जो नहीं हैं इससे सहमत
कहती हैं और इसे सह मत
 
करवा चौथ का जो गुणगान करें
कुछ इसकी महिमा तो बखान करें
कुछ हमारे सवालात हैं
उनका तो समाधान करें
 
डाँक्टर कहें
डाँयटिशियन कहें
तरह तरह के
सलाहकार कहें
स्वस्थ जीवन के लिए
तंदरुस्त तन के लिए
पानी पियो, पानी पियो
रोज दस ग्लास पानी पियो
 
ये कैसा अत्याचार है?
पानी पीने से इंकार है!
किया जो अगर जल ग्रहण
लग जाएगा पति को ग्रहण?
पानी अगर जो पी लिया
पति को होगा पीलिया?
गलती से अगर पानी पिया
खतरे से घिर जाएंगा पिया?
गले के नीचे उतर गया जो जल
पति का कारोबार जाएंगा जल?
 
ये वक्त नया
ज़माना नया
वो ज़माना
गुज़र गया
जब हम-तुम अनजान थे
और चाँद-सूरज भगवान थे
 
ये व्यर्थ के चौंचले
हैं रुढ़ियों के घोंसले
एक दिन ढह जाएंगे
वक्त के साथ बह जाएंगे
सिंदूर-मंगलसूत्र के साथ
ये भी कहीं खो जाएंगे
 
आधी समस्या तब हल हुई
जब पर्दा प्रथा खत्म हुई
अब प्रथाओ से पर्दा उठाएंगे
मिलकर हम आवाज उठाएंगे
 
करवा चौथ का जो गुणगान करें
कुछ इसकी महिमा तो बखान करें
कुछ हमारे सवालात हैं
उनका तो समाधान करें

========================== 
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#13919 From: Rahul Upadhyaya <upadhyaya@...>
Date: Fri Oct 2, 2009 7:16 am
Subject: mai.n aab huu.N, magar - मैं आब हूँ, मगर …
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मैं आब हूँ, मगर …
राहुल उपाध्याय
 
मैं आब हूँ
मगर बेताब नहीं हूँ
आपे से बाहर हो जाऊँ
इतना बदहवास नहीं हूँ
कि उठूँ और उठ के
सबको डूबो दूँ
मैं सर से कदम तक
लबलबाता
सैलाब नहीँ हूँ
 
मैं सोता हूँ
बहता हूँ
गुज़रता हूँ बागों से
हरी-भरी क्यारियोँ में
मिलता हूँ प्यासों से
मैं आब हूँ
मगर तेज धार नहीं हूँ
कि गिरूँ और गिर के
सबको मिटा दूँ
मैं उपर से नीचे
भड़भड़ाता
प्रपात नहीँ हूँ
 
अंजलि भरो
भर के मुँह से लगा लो
घड़े भरो
भर के सर पे बिठा लो
तुम जैसे कहो
बिलकुल वैसे रहूँ मैं
जिस रूप में भी ढालो
उस रूप में ढलूँ मैं
लोटे में
बाल्टी में
किसी में भी डालो
ठंडे में
गरम में
किसी में मिला लो
मैं आब हूँ
मगर 'फ़ेक' आब नहीँ हूँ
कि पल भर चमकूँ
और गायब हो जाऊँ
मैं सूरज के भय से
सकपकाता
शब-आब नहीँ हूँ
 
धरा से परे
तुमने जहाँ धरा कदम है
न पा के मुझे
किया किस्सा खतम है
तुम मुझ पे हो निर्भर
मुझ बिन निर्बल
मुझ से है जीवन
जलते हो मुझ बिन
मैं आब हूँ
मगर  तेजाब नहीं हूँ
कि छल से छलकूँ
और सबको सताऊँ
मैं तिरिया के नैनों में
डबडबाता
बे-हिस-आब नहीँ हूँ
 
सिएटल | 425-898-9325
1 अक्टूबर 2009
====================
आब = पानी
प्रपात = झरना
फ़ेक = fake
शब-आब = ओस
बे-हिस = भाव रहित
तिरिया = स्त्री 
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#13918 From: Rahul Upadhyaya <upadhyaya@...>
Date: Tue Sep 29, 2009 6:21 am
Subject: maataa - माताएँ खलनायकों की
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माताएँ खलनायकों की
राहुल उपाध्याय
 
रात को सोते समय
बेटे को सुनाता हूँ कहानी
राम के
कृष्ण के
उद्भव की कहानी
 
बहुत दिनों तक
सुन लेने के बाद
बेटा एक दिन बोला
 
कृष्ण की माँ थी देवकी
और यशोदा जी ने उन्हें पाला
राम की माँ थी कौशल्या
और कैकयी ने उन्हें निकाला
 
लेकिन
रावण की
कंस की
माँ के बारे में
क्यूँ नहीं कुछ बताया?
 
क्या कहूँ?
कैसे कहूँ?
कैसे उसे समझाऊँ
कि इस कोशिश में
कि कहानी सशक्त बन सके
कई खटकर्म किए हैं जाते
घटनाएँ जोड़ी जाती हैं
पात्र छाँटे जाते
खलनायक पैदा नहीं होते
खलनायक बनाए हैं जाते
तरह तरह के जामे
पहनाए उन्हें हैं जाते
नख-शिखा-दाढ़ी-मूँछ
सर-सींग लगाए हैं जाते
 
खलनायक पैदा नहीं होते
खलनायक बनाए हैं जाते

सिएटल | 425-898-9325
विजय दशमी, 2009

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#13917 From: Rahul Upadhyaya <upadhyaya@...>
Date: Fri Sep 18, 2009 2:58 pm
Subject: Arjun - अर्जुन आँखें
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अर्जुन आँखें
राहुल उपाध्याय
 
हाईवे बने
और गाँव के गाँव
उजड़ गए
लोग
फ़र्राटे से
हवा से बातें करते-करते
उपर-उपर से निकल गए
 
जब से जी-पी-एस आया
समंदर, झील, तालाब, झरने
सब के सब ओझल होते जा रहे हैं
इस्कान का मंदिर
बच्चों का स्कूल
रंग बदलते पत्ते
सामने होते हुए भी
दिखाई नहीं देते

हमारी
अर्जुन आँखें
गड़ी रहती हैं
एल-सी-डी स्क्रीन के
एक
नीले
नुकीले
तीर पर
 
सिएटल | 425-898-9325
17 सितम्बर 2009
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#13916 From: Rahul Upadhyaya <upadhyaya@...>
Date: Wed Sep 16, 2009 5:26 am
Subject: gul - गुल खिलाना है बाकी
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गुल खिलाना है बाकी
राहुल उपाध्याय
 
अभी लाश नहीं हूँ
अभिलाषा है बाकी
चाहा है तुमको
तुम्हें पाना है बाकी
 
दिल में मेरे तुम
कब से बसे हो
आँखों से आँखें
मिलाना है बाकी
 
आते ही रहते हो
ख़्वाबों में हर दिन
रातों में उनका
आना है बाकी
 
सबसे हसीं तुम
जग में सनम हो
हाथों से तुमको
सजाना है बाकी
 
बागी नहीं
बागबां है राहुल
बागों में फिर से
गुल खिलाना है बाकी

सिएटल | 425-898-9325
15 सितम्बर 2009
(अमरीका आने की 23 वीं वर्षगाँठ)
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#13915 From: Rahul Upadhyaya <upadhyaya@...>
Date: Tue Sep 15, 2009 6:54 am
Subject: paheliyaa.N - पहेलियाँ
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पिछले वर्ष की तरह इस बार भी
हिंदीदिवसकेउपलक्ष्यपरप्रस्\
ुतहैंकुछ
पहेलियाँ।पहेलियोंकेउत्तरसे'\
ुद्ध हिंदी' वालोंको आपत्ति हो
सकती है। क्योंकि कुछशब्द या तो
उर्दू के हैं या अंग्रेज़ी के-
शुद्ध हिंदी के नहीं। या ये
कहूँ कि उनकी जड़ संस्कृत में
नहीं है। मैं ये समझता हूँ कि
ऐसे शब्दों से हिंदी समृद्ध
होती है, नष्ट नहीं। चाहे कितनी
ही नदियाँ सागर में मिल जाए,
सागर नष्ट नहीं
  होता, भ्रष्ट नहीं होता,
प्रदूषितनहींहोता।
 
कैसे हल करें? उदाहरण स्वरूप
पहेली #19 से पहेली #26 और उनके हल
देखें। कुछ उदाहरण नीचे भी देख
लें।
 
(1)
जब भी कहीं लगा X XX(1, 2)
साधु-संतों को किया XXX(3)
 
(2)
यह बात सच सौ XXXहै (3)
कि आरक्षण वालों ने कम XX Xहै (2,1)
 
(3)
जिन्हें सताते XXXXहैं (4)
क्या वे भक्त XX X Xहैं? (2, 1, 1)
 
(4)
इठलाती हसीनाओं को कभी अपना X XX(1,
2)
क्या पता कब डस लें बन के XXX(3)
 
बोनस:
तुम्हारी बाहों ने दी थी मुझे XX
XXX(2,3)
वो सच था या थी कोरी XXXX ? (3.5)
 
उदाहरण:
क-
जबतकदेखानहीं??? (3)
अपनीखामियाँनज़र?? ?(2, 1)
 
उत्तर:
जबतकदेखानहींआईना
अपनीखामियाँनज़रआईना
 
ख-
मफ़लरऔरटोपीमेंछुपा?? ?? (2, 2)
जैसेहीगिरीबर्फ़औरआई??? (3)
 
उत्तर:
मफ़लरऔरटोपीमेंछुपासरदिया
जैसेहीगिरीबर्फ़औरआईसर्दियाँ
 
अधिकमददकेलिएअन्यपहेलियाँयह\
ँदेखें:
http://mere--words.blogspot.com/search/label/riddles_solved
 
शुद्धहिंदी के विषय पर आप मेरा
एक लेख और एक कविता यहाँ देख
सकते हैं:
 
शुद्धहिंदी- एकआईनेमें-
http://mere--words.blogspot.com/2007/12/blog-post_03.html
बदलतेज़मानेकेबदलतेढंगहैंमेर\
- http://mere--words.blogspot.com/2008/06/blog-post_18.html
 
सद्भाव सहित,
राहुल 
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#13914 From: Rahul Upadhyaya <upadhyaya@...>
Date: Tue Sep 15, 2009 6:45 am
Subject: Re: पहेली 31
upadhyaya
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उत्तर: गोली
 
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________________________________
From: Rahul Upadhyaya <upadhyaya@...>
To: Anubhuti Hindi Yahoogroup <anubhuti-hindi@yahoogroups.com>
Sent: Saturday, August 29, 2009 11:36:04 PM
Subject: पहेली 31


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पहेली 31
राहुल उपाध्याय
 
खाऊँ जो एक तो हो जाऊँ मैं चित्त
खा लूँ जो तीन तो हो जाऊँ मैं ठीक

खा के जिसे जवां होते शहीद
खाते उसे बच्चे खुशी से खरीद
 
कैसा ये जादू है? कैसी है ये
माया?
समझा वही जो रंगोली देख पाया
=========================
इस पहेली का उत्तर इसकी अंतिम
पंक्ति में छुपा हुआ है। 
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#13913 From: Rahul Upadhyaya <upadhyaya@...>
Date: Mon Sep 14, 2009 6:37 am
Subject: tumhaare binaa - तुम्हारे बिना
upadhyaya
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तुम्हारे बिना
राहुल उपाध्याय
 
बागी ---
बागबां ---
बागों ---
गुल ---
 
ऐसा नहीं
कि गला रूंध गया
या कलम टूट गई
या शब्द नहीं मिलें
 
बल्कि
मैं यह दिखलाना चाहता हूँ कि
कितने बेमानी हैं शब्द
शब्दों के बिना
 
जैसे
मैं
तुम्हारे बिना
 
सिएटल | 425-898-9325
13 सितम्बर 2009 
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#13912 From: Rahul Upadhyaya <upadhyaya@...>
Date: Sun Sep 13, 2009 6:17 am
Subject: mere dil - मेरे दिल पर जो लिखा है
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मेरे दिल पर जो लिखा है
राहुल उपाध्याय
 
ये मेरे दिल पर
जो तुमने
टाईप राईटर से लिखा है
उसे अगर बदलोगी
तो बहुत गड़बड़ हो जाएगी
 
लिखोगी कुछ
पढ़ा कुछ जाएगा
नया-पुराना सब
गड्डमड्ड हो जाएगा
 
अगर बदलना चाहो
तो सिर्फ़ दो ही सूरते हैं
या तो मुझे भस्म कर दो
या फिर कोई ऐसी करेक्शन फ़्लूईड
ले आओ
जो फिर से मुझे कोरा कर दे
 
सिएटल | 425-898-9325
12 सितम्बर 2009
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#13911 From: Rahul Upadhyaya <upadhyaya@...>
Date: Sat Sep 12, 2009 7:24 am
Subject: tumhaarii sehat - तुम्हारी सेहत
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तुम्हारी सेहत
राहुल उपाध्याय
 
आओगे तुम तो, तुमसे करवाएंगे
काम
बागों में बगीचों में तुमसे
डलवाएंगे खाद
होटलों के गंदे कमरे तुमसे
करवाएंगे साफ़
डाक्टरों की वर्दियाँ भी तुमसे
करवाएंगे तैयार
लेकिन तुम्हारी सेहत का न कभी
कोई होगा जिम्मेदार
 
वैध-अवैध के चक्कर में कुछ ऐसे
फ़सें वैद्य-साहूकार
कि देशवासियों को छोड़ के करते
दुनिया का उपचार
आज नाईजिरिया तो कल ईथियोपिया
का करते जीर्णोंद्धार
और दूर-दराज के गाँव में जा के
देते टीकों का उपहार
लेकिन तुम्हारी सेहत के न वे
कभी बनते जिम्मेदार
 
वैध-अवैध का भेद न देखें, जब जम
कर कर लेती सरकार
काम कराए और खूब कराए, कम वेतन पे
साहूकार
जो भी चाहो हम से ले लो, पल पल
ललचाते बाज़ार
पैसा-कौड़ी पास नहीं तो ले लो
किश्तों पे उधार
लेकिन तुम्हारी सेहत का न कभी
कोई होगा जिम्मेदार
 
बेटा वैध, बाप अवैध, जहाँ कहता हो
संविधान
कागज़ के पुर्जो पे निर्भर जहाँ
हो इंसानों की जान
दूसरों की ज़मी छीन के जहाँ पर
बनते हो मकान
उस जहाँ के बाशिंदे क्या
समझेंगे क्या होता है ईमान?
इसीलिए तुम्हारी सेहत का न कभी
कोई होता जिम्मेदार
 
सिएटल | 425-898-9325
11 सितम्बर 2009
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#13910 From: Rahul Upadhyaya <upadhyaya@...>
Date: Thu Sep 10, 2009 6:03 am
Subject: 09-09-09 - नौ, नौ, नौ?
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नौ, नौ, नौ?
राहुल उपाध्याय
 
नौ, नौ, नौ?
नो, नो, नो!
बस
तीन साल,
तीन महीने,
और तीन दिन और
फिर
विश्व में होगा
एक भयंकर विस्फ़ोट
आएगी प्रलय
और
होगा सबका अंत
कहते हैं
टी-वी पे बैठे विद्वत् जन
 
अरे! गिनती गिनना अगरचे आवश्यक
अवश्य
गूढ़ अर्थ तलाशना उनमें है एक
व्यर्थ प्रपंच
कैलेंडरों में तिथियाँ
आती-जाती रहीं सर्वदा
लेकिन कैलेंडर देख के कभी कुछ न
घटा
न बिजली गिरी, न बरसी घटा
न आए भूकम्प, न उबली धरा
आज तक आए जब-जब संकट यहाँ
इंसा का हाथ मिला सदा हाथ पे धरा
 
सिएटल | 425-898-9325
9 सितम्बर 2009
 
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